हज़रत महेदी अलै. ने फ़रमाया के
" रिज़्क़ के लिए जो तवक्कुल किया जाए वो तवक्कुल नहीं,"
क्यों के रिज़्क़ के मुतालिक तो ख़ुदा-ए-ताला वादा फरमा चूका है के
" और नहीं है कोई जानदार जमीन में मगर अल्लाह पर है रिज़्क़ इस का (11:6) "
" रिज़्क़ के लिए जो तवक्कुल किया जाए वो तवक्कुल नहीं,"
क्यों के रिज़्क़ के मुतालिक तो ख़ुदा-ए-ताला वादा फरमा चूका है के
" और नहीं है कोई जानदार जमीन में मगर अल्लाह पर है रिज़्क़ इस का (11:6) "
ये वादा ख़ुदा का है अगर इस वादे पर इमान रखता है तो मोमिन है वरना काफिर है, क्यों के अगर काफिर तुझ से वादा करे के आज में तुझ को मेहमान रखूँगा तो तू इस के वादे पर तमाम रोज़ भुखा रहता है और कुछ नहीं खाता। पस वादा खुदा-ए-ताला का है के सादिक़-उल-वादा है।"
( इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न. 21)


