और नेज़ हज़रत महेदी अलै. ने फ़रमाया के "जिस वक़्त बयान किया जाता है क़ुरआन का, मानी समझने के लिए नूर-ए-ईमान काफी है।"
(हाशिया इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न. 7)