नक़ल है के एक रोज़ मीरां सय्यद महेमुद रज़ी. तम्हीद पढ़ते थे। हज़रत महेदी अलै. ने पूछा क्या पढ़ते हो? मीरां सय्यद महेमुद रज़ी. ने अर्ज़ किया के तम्हीद पढ़ता हूँ,
हज़रत महेदी अलै. ने फ़रमाया के "छोड़ दो और ज़िक्र की कोशिश करो; ताके ऐसी हालात पैदा हो के (तम्हीद को) समझ सको।"
(हाशिया इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न. 8)


