और नेज़ नक़ल है हज़रत महेदी माउद अलै. ने फ़रमाया "अगर ला इलाहा इलल्लाह मोमीन के दिल पर इस क़दर तहर जाए जैसा के एक घर रुई से भरा हुवा हो वहाँ एक चिंगारी दाल दी जाए और उसी वक्त निकाल ली जाए तो जिस जगह के वो चिंगारी दाली जाती है वो जगह जल जाती है। लेकिन ला इलाहा इलल्लाह की सिफत ऐसी है के गैरूल्लाह की सारी मोहबत्तों को जला देती है।"
हम पर अफ़सोस है के हमारी तमाम उम्र में एक बार भी ऐसा न हुवा के हमारे दिल पर ला इलाहा इलल्लाह इतनी मिक़दार तहर जाए।
(इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न.19)


