नक़ल है के खांबेल में तीन सौ मन जवारी (ज्वार) बंदगी मियाँ सय्यद खुन्दमिर रज़ी. को देने के लिए मालिक हुसैन भट्टी ने क़स्बा के नाम चिट्ठी लिख कर (हज़रत की खिदमत में) भेजा । और कहला भेजा के किसी को ये जवार लाने के लिए रवाना कीजए।
बंदगी मियाँ ने चिट्टी वापस भेज दी और फ़रमाया के "बंदगाँ-ए-ख़ुदा गल्ला के लिए गांव गांव नहीं जाते, जो कुछ किस्मत का लिखा है बे-वास्ता पहुँच जाये टी वही लेते हैं।"
(हाशिया इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न. 30)


