और नेज़ मियाँ शेर मलीक रज़ी. से मनकुल है आप ने आप हज़रत महेदी अलै. के हुजूर में अर्ज़ किया "जो कुछ खुन्दकार फरमाते हैं वो सब हक़ है पास ये लोग (मुखालिफिन-ए-महेदी अलै.) किस लिए मुखालिफत करते हैं?"
तो महेदी अलै. ने फ़रमाया के "लोग ज़ईफ़ हैं अगर उन में क़ुव्वत होती तो बन्दे को संगसार करते. इस लिए के अगर किसी ने किसी के महेबुब को बुरा कहा तो आशिक़ कैसे खुश हो?"
" दुनिया उनकी (मुखालिफिन-ए-महेदी अलै. की) महेबुब है और यहाँ (दायरा ए महेदी अलै.) रात दिन दुनिया की मज़म्मत होती है पस उन को (आशिक ए दुनिया को) क्युँ अच्छा मालुम हो?"
( इंसाफ नामा - मतन शरीफ, न. 6)


