नक़ल है जब हजरत सय्यद खुन्दमिर रज़ी. की पटन में पहेली मुलाक़ात हजरत इमामना महेदी अलै. से हुई, मुलाक़ात के बाद ख़ुदा ए ताला ने दरयाफ्त किया “ ऐ सय्यद खुन्दमिर तु ने देख लिया, तेरी ज़ात से बशरी कसाफत को हम ने किस हद दूर कर दिया है, ये तुझ पर हमारा एहसान है. पस इस एहसान की शुक्र गुजारी में तू हमारे पास क्या तोहफा लाया है ?”
हजरत बंदगी मियाँ सय्यद खुन्दमिर रज़ी. ने अर्ज़ किया “ऐ मेरे परवर दीगर ! मुझे बीवी और बच्चे नहीं हैं के मैं उन्हें तुझ पर कुर्बान कर दूँ, अलबत्ता सर का ये तोहफा हाज़िर करता हूँ.”
हुक्मे खुदावन्दी हुआ "ऐ सय्यद खुन्दमिर..! हम तेरे सर के ही ख्वाहिश मंद हैं, जो कोई हमारी ज़ात का तलबगार हो, उसे अपने सर से हाथ धोना पड़ता है."
हज़रत सिद्दीक-ए-विलायत ने जनाबे बारी ताला में अर्ज़ किया के "ऐ परवार दीगर ! यह एक सर है अगर सौ (100) भी हों तो तुझ पर क़ुर्बान कर दूंगा."


