खुरासान का सफ़र था. हजरत महेदी माउद अ.स. के साथ काफ़िला चल रहा थे; न कोई सवारी न कोई ज़ाद ए सफ़र का इन्तेजाम था. बस लोग जोक़-दर-जोक़ (इक्कठा) आप के चले आ रहे थे. लोग निहायत तकलीफ में थे. फ़ाके पे फ़ाका था. न चलने की हिम्मत न रुकने की सूरत.  तारीख ए महेदविया में जा-ब-जा इस वाकिए का ज़िक्र आया है के कुछ लोग जो चलने की ताखत न रखते थे कभी कभी अपने घुटनों पर कपडा बांधकर रेंगते हुए चलते थे. हज़रत बंदगी मियाँ युसुफ़ सुहैत रज़ी. भी काफ़िले में थे. एक मक़ाम पर आप (रज़ी) दरख्त की छाऊँ में अपने पैर के फपोले मस करते हुए हज़रत महेदी माउद अ.स. से पूछा के “इमामुना (अ.स.) आप ने कहा के महेदियों पर एक सख्त तरीन अजमाइश का वक्त भी आएगा वो किस ज़माने में होगा?” हज़रत महेदी माउद अ.स. ने फ़रमाया मियाँ सुहैत, वो वक्त यही है. लेकिन तुम्हारी काबिलियत बड़ी है इसलिए तुम को तकलीफ मालुम न हुई. इसी दौरान हज़रत महेदी माउद अ.स. रस्ते के किसी तीले पर चढ़ कर अल्लाह से इल्तेजा कुछ यूँ करते हैं के “या अल्लाह, जो लोग गुजरात से मेरे साथ अपने अजीजों को, अपने माल ओ कारोबार को और कुछ लोग अपने बीवी और बच्चों को तक छोड़ कर मेरे पीछे आए हैं ये नहीं के मैं ने इनको कोई जर ओ माल का लालच दिया है न ही मैं ने इनका कुछ माल अपने पास रख लिया है. ये सब तेरे सच्चे आशिक़ हैं और तेरे इश्क के खज़ाने से दीदार हासिल करने की लालच में मेरे पीछे पीछे दीवाना वार चले आ रहें हैं, या अल्लाह तू इन सब पर अपना फज़ल फरमा.” इस के बाद अल्लाह का फजल हुआ और उसी वक़्त सब मुहाजिरीन को दीदार ए इलाही की ओ नेमत मिली के सब मसरूर हो गए.(अल्लाहु अक्बर)
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