गिरोहे महेदविया का यह खास तरीखा है के मोहर्रम की दसवी तारीख नमाज़े फजर के बाद लोग एक दुसरे से मिलकर अपना बोलाचाला माफ़ करवाया करते हैं। जिसकी वजह से दिलों की रंजिश या बुराई दूर होकर आपस में एक दुसरे से सब का साफ दिल रहना लाज़मी होता है।
रिवायत मशहुर से साबित है के हजरत इमाम हुसैन रजी. जब 10 (दस) मोहर्रम को मैदाने करबला में जंग करने के लिए तशरीफ़ ले जाने लगे तो सब अपने साथियों और बाल बच्चो से बोलाचाला माफ़ करवा लिया था। क्यूँ के आप को वापीस लौटने सर बढ़कर अपनी शहादत का यकीन था। इमाम हुसैन की शहादत के बाद आपकी यादगार में अहले बैत के घरानों में ये अमल था। बाद में यह अमल मतरुक हो गया। लेकिन हजरत इमामना महेदी माउद अलै. ने ब-हुक्मे खुदा जारी रखा। और बाज़ अहादीस से अमर जाहिर है के क़यामत आशूरा मोहर्रम के दसवी तारीख ही होगी। क्या मालुम के अब जो अशुरा आनेवाला है मुमकिन है वही क़यामत का दिन हो। पस अहले ईमान उस वक्त रहें भी तो उनका आपस में एक दुसरे से साफ दिल होकर रहना बेहतर है। (खुवतुल इमान)


